Monday, October 4, 2010

हाँ मशीन भी दिलफेंक होते हैं और यह गुनाह नही

वह एक मशीन है.उसे प्यार हो जाता है..लेकिन उसे प्यार उसी लड़की से हो जाता है जो उसके मालिक की महबूबा है.मालिक यानि जिसने उस मशीन को बनाया है...जब मालिक को पता चलता है की उसका बनाया मशीन उसी की महबूबा को चाहने लगा है तो उसे अपने मशीन से जलन होने लगती है...हालाँकि उसकी महबूबा उस मशीन से प्यार नही करती..वह उसे समझती है की वह एक औरत है और उससे प्रेम का हक सिर्फ पुरुष को है...मशीन उससे प्यार करे यह प्रकृति के खिलाफ है...लडकी मशीन से आग्रह करती है की वह उसे भूल जाये साथ में वह यह भी कहती है की तुम्हारे लिए भूलना आसान है क्यूंकि तुम एक मशीन हो...मशीन कोई प्रतिकार नही करता अपने प्यार का सम्मान करते हुए सर लटकाए वहां से लौट जाता है....
उसकी सादगी,उसका त्याग बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है...क्या कोई इतनी मोहब्बत करता है आज के जमाने में....या अगर माना कोई भूल से प्यार कर भी बैठे तो क्या महबूबा के यह कहने पर की तुम मुझे भूल जाओ तुम ऐसा कर सकते हो,बिना प्रतिकार,बिना कुछ कहे कोई प्रेमी लौट सकता है...मुझे तो नही लगता...तो क्या अब प्यार भी हमे मशीनों से सीखनी होगी..पर इसे बनाने वाले तो हम खुद हैं ,,,फिर...कहीं तो कुछ गडबड है ,,.......
मशीन एक रोबोट है...उससे कई गलतियाँ ऐसी होती हैं जो मानवजाति के लिए विनाशकारी हैं..हालाँकि यह एक लालची वैज्ञानिक की करामत है...अदालत आदेश देती है की इस रोबोट को तोड़ दिया जाये,,फ़िलहाल इसकी जरुरत नही...रोबोट का मालिक उसके सामने है,,बगल में ही उसकी महबूबा भी खड़ी है...कई और लोग हैं...सबकी आँखे नम हैं....अंतिम विदाई लेते हुए रोबोट अपने मालिक से कहता है की माफ़ करना तुम मेरे मालिक हो और मै तुमसे ही गद्दारी कर बैठा,,मैंने नियम तोडा है....मालिक बोलता है नही..गलती तुम्हारी नही है....यह नियम तोडना आखिर तुमने हम मनुष्यों से ही तो सिखा है........
रोबोट के ज्ञान के परिक्षण के लिए उसे सबके सामने पेश किया जाता है...सभी उससे तरह तरह का सवाल करते है...एक सवाल आता है..तुम्हे क्या लगता है भगवान होता है,,,रोबोट पूछता है...भगवान मतलब क्या...
पूछने वाला कहता है मतलब जिसने हम सबको बनाया होगा....रोबोट मुस्कराकर वैज्ञानिक की तरफ इशारा करके जवाब देता है....मुझे तो इन्होने बनाया है,,,अगर ये हैं,,,,तो हाँ भगवान होता है...................
सच इस मशीन रोबोट से एक सफल मनुष्य होने के कई गुर सिख सकते हैं...या यूँ कहें की हम जितना सब कुछ मेहनत करके मशीनों में फीड के रहे हैं उसका कुछ हिस्सा खुद के पास रख लें तो कितना अच्छा हो.....
इस उम्मीद में की हमारा कल हमारे बनाये किसी मशीन से बेहतर होगा..दीजिये इजाजत ,,प्रेमी को...




Saturday, October 2, 2010

हमे तरक्की चाहिए आस्था और जमीन का बंटवारा नही




अयोध्या विवाद में फैसला आ चूका है...मेरे विचार से कोर्ट ने अपने तरफ से बहुत सोच समझ कर निर्णय दिया है फिर भी अगर आपति कोई है तो सबसे बड़े न्यायलय का दरवाजा अभी खुला है....मसला यह नही है...मसला तो इससे अलग और कहीं इससे भयावह है....
फैसले से पहले जिस तरह के हालत बनाये जा रहे थे उससे पूरे यूपी समेत देश भर में आग लगनी थी....कम से कम यूपी तो जलना ही था....हिन्दू मुस्लिम के बीच खटास तो पैदा ही होनी थी....अरे मियां ऐसा क्या हुआ, कुछ नही हुआ ...एक पथर तक नही चला ..बस यही बात नागवार गुजरी है उन नामर्दों को जो एक बार फिर आग लगाना चाहते थे ईस देश में...धू-धू कर जलते देखना चाहते थे इस देश को....९२ में ये इसी की आड़ में अपनी राजनीती चमका चुके हैं,,,आज राजनीती अवसान पे देख फिर से आग लगाना चाहते है..मुस्लिम भाइयों को बरगलाया जा रहा है की उनके साथ धोखा हुआ है,,,अन्याय हुआ है...उन्हें उनका हक मिलना चाहिए था...पर उनकी बात कोई नही सुन रहा तो उनके सिने पे सांप लोट रहा है...
ये नामर्द भूल गये हैं की ये ९२ नही है ...भारत २०१० के आगे जा रहा है....माना की ९२ में हम तथाकथित धर्म के ठेकेदारों की बहकावे में आ गये थे ,,माना की तब हमने वो किया था जो गलत था , हर लिहाज से....माना की तब हम मुर्ख बन गये थे...हमे अपने गलती का एहसास है और पछतावा भी..पर हम इतने बड़े मुर्ख भी नही है की एक ही गलती बार बार करें....
आज हम ऐसे जगह खड़े है जहाँ से हम दुनिया से टकराने का सपना देखते हैं....हमे नही अपनों से टकराना ....हमे तरक्की चाहिए,,जमीन और आस्था का बटवारा नही.....जमीन फांककर इस पेट की भूक नही मिटनी है अन्न चाहिए...आस्था भी भूखे पेट नही होती...धर्म के नाम पर हमे बाँटकर अपनी रोटियां सीकने वालों गुजारिश है की उस रोटी को अब कचा ही खाना सिख लो क्यूंकि अब तुम्हारी उस रोटी को पकाने के लिए हम आंच नही बनने वाले......t
बहुत बड़े हमारे हितैषी बनते हो न तो दो हमे रोजगार,,रोटी,कपड़ा,मकान..पानी,बिजली,,स्वाश्थ्य,,,,क्यूँ चुप क्यों हो इसलिए की अब हम लड़ नही रहे या इसलिए की हमने अब अपने हक की बात करनी शुरू कर दी है....दो हमे भी सत्ता में हिस्सेदारी...क्या दे पाओगे,,,अरे तुम क्या दोगे हम खुद वहां भी अपने लिए रास्ता बना लेंगे तुम अब बस तमाशा देखो..देखो हमारी तरक्की,,हमरा मिलन...एक एक करके तुम सभी को हम किनारे लगायेंगे...नया नेतृत्व लायेंगे....देश की रफ्तार और हमारे विकास से डर लग रहा है तुहे जो तुम हमारी धारा मोड़ना चाहते हो चेत जाओ...शायद तुम्हे जनता की हुंकार का अंदाजा नही......पर जल्द हो जायेगा ..समेट लो अपनी थोथी मानसिकता...वरना पछताना पड़ेगा,,,,साथ बने रहना चाहते हो तो बात करो अमन की,तरक्की की,भाईचारे की,,,न की बटवारे की....
और अंत में....
खाली करो सिंघासन की अब जनता आती है,,,,,

Wednesday, September 29, 2010

..एक ख़ूबसूरत उजाला सामने है...चिड़ियाएँ रोजाना की तरह चहचहा रही हैं..अंकल रोजाना की तरह दूध लेने जा रहे हैं...वो छोटी गुडिया दादी के साथ आज भी गली में


सबह के पांच बज चुके हैं। अभी तक सोया नही....एक अजीब सी उलझन है मन में..रह-रह कर मन बेचैन हो रहा है..पूरी रात इसी सोच में गुजरी है की आज क्या फैसला आएगा...फैसले के बाद क्या होगा..कहीं कुछ गलत तो न होगा....रात के २ बजे हैं मै उठ के पानी पिता हूँ और रूम की बत्ती जलाता हूँ......रूम में चारो तरफ उजाला हो गया है पर भीतर मेरे अँधेरे ने घर कर लिया है....उजाले में भी कुछ धुंधलका सा दीखता है.....खुद से ही डरने लगा हूँ..खिड़की से बाहर झांकता हूँ...अजीब अजीब से प्रतिबिम्ब दिखाई देते है...पर्दा गिरा देता हूँ....अभी कुछ देर पहले मै हिम्मत की बात कर रहा था..एक कविता भी लिखी कुछ वैसे ही...पर चंद घंटो बाद ही मै इतना डरपोक हो गया,,,कैसे नही जानता..पर आँखों में फैली दहशत इस बातके इशारे के लिए काफी है की मै बहुत डरा हूँ....अचानक रूम में खडखडाहट होती है....डरता हूँ ....नजर घुमाता हूँ ...दूर उस कोने वो चुहिया फिर आई है...मेरे कल के अख़बार पर बैठ गयी है और कुतरना चालू है....देखता हूँ उसे और बरबस हंस पड़ता हूँ...बेचैनी में हंसी देर तक चेहरे पर नही बनी रहती....चुहिया को रोजाना भगा देता था आज उस पर प्यार आ रहा है या ये कहिये की तरस ...देखता हूँ वह अख़बार पर बने बाबरी ढांचे की तस्वीर को कुतर रही है.....अचानक फिर नजर जाती है बाबरी कुतर चूकि है और दूसरे पेज पर छपा रामजन्मभूमि की तस्वीर दिखने लगती है...मै सोचता हूँ चुहिया क्या फैसला सुना रही है....फिर बेचैन निगाहे खिड़की से बाहर देखती हैं..गली में कुत्तों का शोर आज कुछ ज्यादा है..या हो सकता है की आज मुझे हर कुछ थोडा अलग सा लग रहा हो..खैर अचानक चुहिया पर फिर नजर जाती है राम भी कुतरे जा चुके हैं....................अब वहां सिर्फ एक शुन्य बचा है...किसी का कोई अस्तित्वा नही दिख रहा....अचानक चुहिया ओझल हो गयी है....मेरी चिंता बढ़ गयी है...तो क्या यह है फैसला ...सच राम,अल्लाह के बाद तो एक बड़ा शुन्य नजर आ रहा है...तो क्या ऐसा शुन्य वाकई पैदा होने जा रहा है....दो बजे से अब तक यही सब सोच रहा हूँ...जाने क्या होगा...बाहर देखता हूँ ..एक ख़ूबसूरत उजाला सामने है...चिड़ियाएँ रोजाना की तरह चहचहा रही हैं..अंकल रोजाना की तरह दूध लेने जा रहे हैं...वो छोटी गुडिया दादी के साथ आज भी अपने uसी अंदाज में गुनगुनाते भाग दौड़ कर रही है...मेरे सामने वाली लडकी जिसे रोजाना ८ के बाद देख पता हूँ आज ५ बजे ही देख लिया आज भी वैसे ही खूबसूरत लग रही है और फूल तोड़ रही है शायद वो पूजा भी करती है आज पता चल गया....मेरा अख़बार वाला भी उसी अंदाज में पेपर फेक गया और एक हल्की मुस्कान बिखेर गया....मेरे बाजू में रहने वाली आंटी की झाड़ू की आवाज़ पहले सी ही है.....

कुछ तो नही बदला ...सब कुछ तो पुराने दिनों की तरह है...किसी के दिल मरे कोई दहशत नही है...सभी अपने काम में मशगुल हैं.....माँ का भी फोन आ गया कैसे हो डर तो नही लग रहा ..पता है नही दरोगे अरे तुम मेरे बहादुर बेटे हो...क्या कहता की तेरा ये वीर सपूत पूरी रात चिंता और भी में सोया नही....


सच अब लग रहा है की झूट का डर पाले बैठा था मैं...क्यूंकि बाहर तो ऐसा कुछ भी नही,,,...


आज ऑफिस भी तो जाना है...माहौल भी मस्त है..कुछ समय भी अपने पास है तो क्यूँ न कुछ देर मै भी सो लूँ,,,,चलिए अगर आप लोग सो लिए हैं तो निकलिए सडकों पर रोजाना की तरह एक बेहतर दिन आपके स्वागत में खड़ा है,,,,यूँ ही प्यार बांटते रहिये.....अमन बांटते रहिये,,,,,

शायद ऐसे ही पूरी होगी खूबसूरत भविष्य की कल्पना......





सड़कों पे दूर तक सन्नाटा पसरा है
सुना कोई फैसला आने वाला है,
माँ कहती है फैसले हमेशा उसी के हित में आते हैं जो सच्चा है,
वो यह भी कहती है की जहाँ सच है वहां भय नही होता ,
जब सचाई की जीत होने जा रही तो भय क्यूँ,ये सन्नाटा क्यूँ,,
तो क्या बुराई की जीत होने वाली है,,
पर राम और अल्लाह में बुरा कौन है,
माँ तो कहती है की दोनों एक हैं,,
गर दोनों एक हैं तो फिर कैसी जीत, कैसी हार
फैसला जो हो ख़ुशी-ख़ुशी होना चाहिए स्वीकार ,,
अगर ऐसा नही हो रहा,
कुछ बेचैनी है,
दिलों में अब भी डर है,
तो जरुर कुछ तो गड़बड़ है,
हमे खंगालना होगा अपने अंतर्मन को,
गहरे झांक के देखना होगा अपने दिल में ,,
हर दिल में समाधान है,,
यही लिखेगा एक सुनहरे कल की इबादत
यहीं से पूरी होगी एक खुबसूरत भविष्य की कल्पना,,,
तो छोडो डरना,
क्यूंकि सबकुछ तुम्हे ही है करना,,
तुम ही डर गये तो फिर इतिहास खुद को दुहरायेगा,,,
बरसों बाद कोसोगे खुद को,
सोचोगे काश नही डरा होता उस वक़्त
मत दो खुद को मौका पछताने का,,
रहो समाज के बीच ,
मत भागो ,सबके बीच रहकर फैसले का सम्मान करो ,,
कल तुम्हारा है.....................एक ख़ूबसूरत कल, जिसकी तुम्हे तलाश है ,,
साहस करके देखो ,दूर छितिज पर कल का वो सूरज निकल रहा है,,,डर का साया हट रहा है,,
राम और अल्लाह हम सबका भला करें...............................

Monday, September 27, 2010

प्यार है तो बोल दो

मेरा तेरे दिल पर राज करना क्या,
मेरी बात पे तेरा मुस्कुराना आखिर क्या है,
घंटों मेरा इंतजार करना,थक कर सोफे के एक किनारे लुढक जाना,
वापिस आने पर प्यार से झगड़ना और घंटों बाँहों में बाहें डाले पुरानी रोमांटिक बातें करना
क्या है,,,,हाँ बताओ क्या है,,
क्या है जो बिन बारिश मेरे न होने पे तुम्हारी आँखों से बरसने लगता है,
क्या है जो मेरे जल्दी घर लौटने की दुआएं करता है
क्या है जो दिन में हर दो घंटे पे मेरा रिंग बज उठता है और सामने तुम्हारी आवाज़ होती है
क्या है,,हाँ बताओ क्या है,
कुछ तो खास है
कुछ तो तेरे दिल के पास है
वरना कमोशियों में शोर सबको नही सुनाई पड़ते
तन्हाइयों में जीने का मकसद हर किसी को नही मिलता
सोचने का वक़्त और उस वक़्त की खूबसूरती वीरले ही मिलती है
कहीं मै तुम्हारा प्यार तो नही
कहीं मै तुम्हारे दिल का सर्कार तो नही
मै नही कहूँगा की मै कौन हूँ
फैसला तुम्हे करना है
क्या हम पहले की तरह फिर धड़क सकते हैं,,
अगर हाँ तो मेरा दरवाजा हमेशा के लिए खुला है
और जनता हूँ की तुम्हारा