Wednesday, September 29, 2010

..एक ख़ूबसूरत उजाला सामने है...चिड़ियाएँ रोजाना की तरह चहचहा रही हैं..अंकल रोजाना की तरह दूध लेने जा रहे हैं...वो छोटी गुडिया दादी के साथ आज भी गली में


सबह के पांच बज चुके हैं। अभी तक सोया नही....एक अजीब सी उलझन है मन में..रह-रह कर मन बेचैन हो रहा है..पूरी रात इसी सोच में गुजरी है की आज क्या फैसला आएगा...फैसले के बाद क्या होगा..कहीं कुछ गलत तो न होगा....रात के २ बजे हैं मै उठ के पानी पिता हूँ और रूम की बत्ती जलाता हूँ......रूम में चारो तरफ उजाला हो गया है पर भीतर मेरे अँधेरे ने घर कर लिया है....उजाले में भी कुछ धुंधलका सा दीखता है.....खुद से ही डरने लगा हूँ..खिड़की से बाहर झांकता हूँ...अजीब अजीब से प्रतिबिम्ब दिखाई देते है...पर्दा गिरा देता हूँ....अभी कुछ देर पहले मै हिम्मत की बात कर रहा था..एक कविता भी लिखी कुछ वैसे ही...पर चंद घंटो बाद ही मै इतना डरपोक हो गया,,,कैसे नही जानता..पर आँखों में फैली दहशत इस बातके इशारे के लिए काफी है की मै बहुत डरा हूँ....अचानक रूम में खडखडाहट होती है....डरता हूँ ....नजर घुमाता हूँ ...दूर उस कोने वो चुहिया फिर आई है...मेरे कल के अख़बार पर बैठ गयी है और कुतरना चालू है....देखता हूँ उसे और बरबस हंस पड़ता हूँ...बेचैनी में हंसी देर तक चेहरे पर नही बनी रहती....चुहिया को रोजाना भगा देता था आज उस पर प्यार आ रहा है या ये कहिये की तरस ...देखता हूँ वह अख़बार पर बने बाबरी ढांचे की तस्वीर को कुतर रही है.....अचानक फिर नजर जाती है बाबरी कुतर चूकि है और दूसरे पेज पर छपा रामजन्मभूमि की तस्वीर दिखने लगती है...मै सोचता हूँ चुहिया क्या फैसला सुना रही है....फिर बेचैन निगाहे खिड़की से बाहर देखती हैं..गली में कुत्तों का शोर आज कुछ ज्यादा है..या हो सकता है की आज मुझे हर कुछ थोडा अलग सा लग रहा हो..खैर अचानक चुहिया पर फिर नजर जाती है राम भी कुतरे जा चुके हैं....................अब वहां सिर्फ एक शुन्य बचा है...किसी का कोई अस्तित्वा नही दिख रहा....अचानक चुहिया ओझल हो गयी है....मेरी चिंता बढ़ गयी है...तो क्या यह है फैसला ...सच राम,अल्लाह के बाद तो एक बड़ा शुन्य नजर आ रहा है...तो क्या ऐसा शुन्य वाकई पैदा होने जा रहा है....दो बजे से अब तक यही सब सोच रहा हूँ...जाने क्या होगा...बाहर देखता हूँ ..एक ख़ूबसूरत उजाला सामने है...चिड़ियाएँ रोजाना की तरह चहचहा रही हैं..अंकल रोजाना की तरह दूध लेने जा रहे हैं...वो छोटी गुडिया दादी के साथ आज भी अपने uसी अंदाज में गुनगुनाते भाग दौड़ कर रही है...मेरे सामने वाली लडकी जिसे रोजाना ८ के बाद देख पता हूँ आज ५ बजे ही देख लिया आज भी वैसे ही खूबसूरत लग रही है और फूल तोड़ रही है शायद वो पूजा भी करती है आज पता चल गया....मेरा अख़बार वाला भी उसी अंदाज में पेपर फेक गया और एक हल्की मुस्कान बिखेर गया....मेरे बाजू में रहने वाली आंटी की झाड़ू की आवाज़ पहले सी ही है.....

कुछ तो नही बदला ...सब कुछ तो पुराने दिनों की तरह है...किसी के दिल मरे कोई दहशत नही है...सभी अपने काम में मशगुल हैं.....माँ का भी फोन आ गया कैसे हो डर तो नही लग रहा ..पता है नही दरोगे अरे तुम मेरे बहादुर बेटे हो...क्या कहता की तेरा ये वीर सपूत पूरी रात चिंता और भी में सोया नही....


सच अब लग रहा है की झूट का डर पाले बैठा था मैं...क्यूंकि बाहर तो ऐसा कुछ भी नही,,,...


आज ऑफिस भी तो जाना है...माहौल भी मस्त है..कुछ समय भी अपने पास है तो क्यूँ न कुछ देर मै भी सो लूँ,,,,चलिए अगर आप लोग सो लिए हैं तो निकलिए सडकों पर रोजाना की तरह एक बेहतर दिन आपके स्वागत में खड़ा है,,,,यूँ ही प्यार बांटते रहिये.....अमन बांटते रहिये,,,,,

शायद ऐसे ही पूरी होगी खूबसूरत भविष्य की कल्पना......





सड़कों पे दूर तक सन्नाटा पसरा है
सुना कोई फैसला आने वाला है,
माँ कहती है फैसले हमेशा उसी के हित में आते हैं जो सच्चा है,
वो यह भी कहती है की जहाँ सच है वहां भय नही होता ,
जब सचाई की जीत होने जा रही तो भय क्यूँ,ये सन्नाटा क्यूँ,,
तो क्या बुराई की जीत होने वाली है,,
पर राम और अल्लाह में बुरा कौन है,
माँ तो कहती है की दोनों एक हैं,,
गर दोनों एक हैं तो फिर कैसी जीत, कैसी हार
फैसला जो हो ख़ुशी-ख़ुशी होना चाहिए स्वीकार ,,
अगर ऐसा नही हो रहा,
कुछ बेचैनी है,
दिलों में अब भी डर है,
तो जरुर कुछ तो गड़बड़ है,
हमे खंगालना होगा अपने अंतर्मन को,
गहरे झांक के देखना होगा अपने दिल में ,,
हर दिल में समाधान है,,
यही लिखेगा एक सुनहरे कल की इबादत
यहीं से पूरी होगी एक खुबसूरत भविष्य की कल्पना,,,
तो छोडो डरना,
क्यूंकि सबकुछ तुम्हे ही है करना,,
तुम ही डर गये तो फिर इतिहास खुद को दुहरायेगा,,,
बरसों बाद कोसोगे खुद को,
सोचोगे काश नही डरा होता उस वक़्त
मत दो खुद को मौका पछताने का,,
रहो समाज के बीच ,
मत भागो ,सबके बीच रहकर फैसले का सम्मान करो ,,
कल तुम्हारा है.....................एक ख़ूबसूरत कल, जिसकी तुम्हे तलाश है ,,
साहस करके देखो ,दूर छितिज पर कल का वो सूरज निकल रहा है,,,डर का साया हट रहा है,,
राम और अल्लाह हम सबका भला करें...............................

Monday, September 27, 2010

प्यार है तो बोल दो

मेरा तेरे दिल पर राज करना क्या,
मेरी बात पे तेरा मुस्कुराना आखिर क्या है,
घंटों मेरा इंतजार करना,थक कर सोफे के एक किनारे लुढक जाना,
वापिस आने पर प्यार से झगड़ना और घंटों बाँहों में बाहें डाले पुरानी रोमांटिक बातें करना
क्या है,,,,हाँ बताओ क्या है,,
क्या है जो बिन बारिश मेरे न होने पे तुम्हारी आँखों से बरसने लगता है,
क्या है जो मेरे जल्दी घर लौटने की दुआएं करता है
क्या है जो दिन में हर दो घंटे पे मेरा रिंग बज उठता है और सामने तुम्हारी आवाज़ होती है
क्या है,,हाँ बताओ क्या है,
कुछ तो खास है
कुछ तो तेरे दिल के पास है
वरना कमोशियों में शोर सबको नही सुनाई पड़ते
तन्हाइयों में जीने का मकसद हर किसी को नही मिलता
सोचने का वक़्त और उस वक़्त की खूबसूरती वीरले ही मिलती है
कहीं मै तुम्हारा प्यार तो नही
कहीं मै तुम्हारे दिल का सर्कार तो नही
मै नही कहूँगा की मै कौन हूँ
फैसला तुम्हे करना है
क्या हम पहले की तरह फिर धड़क सकते हैं,,
अगर हाँ तो मेरा दरवाजा हमेशा के लिए खुला है
और जनता हूँ की तुम्हारा

Tuesday, April 6, 2010

यहाँ चाय वाला चाय नही देता


यहाँ चाय वाला चाय नही देता .किरण हंसने को मजबूर करती है .शिशिर के साथ रहने जा रहा हूँ .दो और सहकर्मी हैं जाने किस मिटटी के बने हुए । उनसे कभी बनती नही .यहाँ कोई कंटीन नही है .पर मुझे कोई फर्क नही पड़ता क्यूंकि मेरा पेट खराब है .वैसे भी मै बहुत कम खाता हूँ पर किरण का क्या होगा ?वो तो बहुत खाती है।

शिशिर भी कैंटीन को लेकर परेशान है .पर वह अडजस्ट करना जानता है या फिर मजबूरी में सिख गया है ...

ईसके बावजूद हम सभी खुश हैं क्युकी हमारे सम्पादक बहुत अछे है ..उनके साथ कम करने में खूब मजा आ रहा है ...दरअसल वे चाहते हैं कि हम कुछ हटकर और नया करें इसका मतलब यह नही है कि हम पत्रकारिता छोडकर कुछ और करने लगें बल्कि इसका मतलब है कि हम आज कि पत्रकारिता से इतर नये जमाने कि पत्रकारिता कि तरफ रुख करें । कुछ नयापन लाये ,कुछ प्रयोग करें .....

बहुत ख़ुशी मिलती है जब आप अपनी शुरुआत अपने मनपसन्द माहौल में करते हैं जहाँ कोई बंदिश नही , जहाँ हर कोई मित्र कि तरह मिले और आगे बढकेअपनाये ..जहाँ हमे अपनी बात रखने का मौका हों ..अपना मनपसन्द कम करने कि छूट हों .....

बस इसीलिए कंटीन न होने के बावजूद हम खुश है ... क्युकी कई बार माहौल ऐसा भरा पूरा होता कि पेट का खालीपन अपना अहसास नही कराता .....हाँ कभी जोरों कि भूख लगती है तो थोडा दूर निकल पड़ते है ...उसका भी अपना अलग मजा है ....

पता है शिशिर बहुत बदल; गया है ...अरे वैसा बदलना नही अब वह समझदार है और हम एक साथ है ...कई बार हमारा साथ दूसरों खलता है पर हम आई आई एम् सी वाले हर माहौल में जीना और रहना जानते है ....

हम उसी तरह पोलिटिक्स भी कर सकतें हैं जैसा सामने वाला करेगा और वैसी ही दोस्ती या फिर दुश्मनी .....

मै प्रेमी हूँ और जल्द ही यहाँ भी प्रेम के रंग बिखेर दूंगा ये मेरा दावा और वादा दोनों है ..शुरुआत कर दी है लोगों के दिलों में उतरने कि ...............................आप के दिल में तो बसा ही हूँगा उम्मीद है

मै लक्ष्मी कैमरा पर्सन शिशिर और किरण के साथ ..लखनौ से

Friday, March 19, 2010

आंखों की उदास बेचैनी और उसकी अंदरूनी आक्रामकता का धनी कलाकार: अजय देवगन













मेरे दोस्तों को मेरा जुमला अजय देवगन की कसम या अजय देवगन ने चाहा तो ,से चिढ़ मचती है। दरअसल उन्हें शिकायत है कि आमिर और शाहरूख के जमाने में भला कोई अजय जैसे छोटे नाम वाले , एक्टर को तवज्जो कैसे दे सकता है. सलमान या अक्षय की बात करता तो भी एक हद तक सही था। पर अजय यह तो हद ही हो गई।
आखिर मैं बार-बार उसका नाम लेकर साबित क्या करना चाहता हूं कि मैं औरों से हटकर सोचता हूं या फिर बात इतनी है कि मुझे बस उनकी एक नहीं सुननी है। ये सभी शिकायते हैं मेरे दोस्तों की मुझसे पर ऐसा नही है कि मैं इनकी शिकायतों पर निरूत्तर हूं पर मैं जबाब कुछ यूं देना चाहता था कि फिर इन्हे कम से मुझसे कोई शिकायत न रह जाए। इसलिए मैने अजय के बारे में मन से अध्ययन किया और अब मैं उसके बारे में कुछ लिखने में सक्षम हूं।

सुना था आंखों से हो रहे संवाद का अहसास गहरे दिल में उतरता चला जाता है। अजय की एक्टिंग देखने के बाद इस अहसास को जीता चला गया। सच ,अजय नहीं बोलते उनकी आंखे बोलती हैं। बगैर शोरगुल और मीडिया हाइप के यह महान कलाकार अपना काम करते जा रहा है और आप को यह जानकर हैरानी होगी कि खान स्टारों के इस तथाकथित दौर में सबसे अधिक काम और विश्वास का पात्र अजय है।
एक्शन डायरेक्टर वीरू देवगन का यह लाडला एक्शन के साथ ही फिल्मों में प्रवेश किया यह किसी संयोग से कम नहीं। फूल और कांटे का वह ढ़ीला-ढीला, औसत चेहरे का एक अनोखे हेयर स्टाइल का एक्शन हीरो अतिथि तुम कब जाओगे तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म के हर विभाग (कामेडी,एक्शन,थ्रीलर,पारिवारिक,ट्रेजडी) का बेताज बदशाह बन जाएगा कम ही लोगों ने सोचा होगा। पर जिसने इसे भांप लिया था उसने इसका सही उपयोग किया और इसका फायदा अजय के साथ उसे भी मिला । इस कड़ी में सबसे पहला नाम महेश भट्ट का है।
अजय की आंखों की उदास बेचैनी, अंदरूनी आक्रामकता को महेश ने अपनी फिल्म जख्म में बखूबी उभारा है। जख्म अजय के फिल्मी करियर का सबसे अहम पड़ाव था। इस फिल्म के बाद अजय कभी पीछे मुड़कर नहीं देखे या यूं कहें कि देखने की नौबत भी नहीं आई।
हम दिल दे चुके सनम और प्यार तो होना ही था ने उनके करियर को नई उंचाई दी तो यहीं से उन्हे उनका प्यार भी मिला । काजोल तो मिली हीं देश के हर कोने का प्यार भी खूब बरसा। प्यार ने अपना असर दिखाना शुरू किया और देखते ही देखते संभावनाओं का यह सितारा अपनी रोशनी बिखेरने लगा।
यह सच है कि अजय के पास शाहरुख-आमिर सरीखी फैन-फालोइंग नहीं है। यह भी सच है कि अजय उनकी तरह ग्लैमराइज नहीं हैं। पर हम यह क्यूं भूल जाते हैं कि अजय की यही खासियत उनहें सबसे अलग और सब पर भारी बनाती है। पर अजय यहां भी अजय ही दिखते हैं जब वे इसके जवाब में सिर्फ इतना कहते हैं कि ,प्लीज मेरी किसी से तुलना मत कीजिए। मेरा कंपटीशन खुद से है। फिर सबके अलग फील्ड हैं ,अलग काम है ऐसे मे तुलना करना उचित नहीं। यह अजय की सादगी है। अजय अपनी इस सादगी के साथ खुश हैं।
बिना किसी संवाद के कयामत सरीखी एक्शन फिल्म के साथ कई फिल्मों को सिर्फ अपनी आंखों के कमाल से सफल बना देने वाला यह सादगी पसंद कलाकार अपनी जिन्दगी को भी खामोशी से आगे बढ़ाता जा रहा है जहां सिर्फ और सिर्फ उंचाइयां हैं।
जिन्दगी में आगे बढ़ते आंखों के जादूगर खामोश कलाकार को शत-शत नमन..............