Tuesday, September 28, 2010
Monday, September 27, 2010
प्यार है तो बोल दो
मेरा तेरे दिल पर राज करना क्या,
मेरी बात पे तेरा मुस्कुराना आखिर क्या है,
मेरी बात पे तेरा मुस्कुराना आखिर क्या है,
घंटों मेरा इंतजार करना,थक कर सोफे के एक किनारे लुढक जाना,
वापिस आने पर प्यार से झगड़ना और घंटों बाँहों में बाहें डाले पुरानी रोमांटिक बातें करना
क्या है,,,,हाँ बताओ क्या है,,
क्या है जो बिन बारिश मेरे न होने पे तुम्हारी आँखों से बरसने लगता है,
क्या है जो मेरे जल्दी घर लौटने की दुआएं करता है
क्या है जो दिन में हर दो घंटे पे मेरा रिंग बज उठता है और सामने तुम्हारी आवाज़ होती है
क्या है,,हाँ बताओ क्या है,
कुछ तो खास है
कुछ तो तेरे दिल के पास है
वरना कमोशियों में शोर सबको नही सुनाई पड़ते
तन्हाइयों में जीने का मकसद हर किसी को नही मिलता
सोचने का वक़्त और उस वक़्त की खूबसूरती वीरले ही मिलती है
कहीं मै तुम्हारा प्यार तो नही
कहीं मै तुम्हारे दिल का सर्कार तो नही
मै नही कहूँगा की मै कौन हूँ
फैसला तुम्हे करना है
क्या हम पहले की तरह फिर धड़क सकते हैं,,
अगर हाँ तो मेरा दरवाजा हमेशा के लिए खुला है
और जनता हूँ की तुम्हारा
Tuesday, April 6, 2010
यहाँ चाय वाला चाय नही देता

यहाँ चाय वाला चाय नही देता .किरण हंसने को मजबूर करती है .शिशिर के साथ रहने जा रहा हूँ .दो और सहकर्मी हैं जाने किस मिटटी के बने हुए । उनसे कभी बनती नही .यहाँ कोई कंटीन नही है .पर मुझे कोई फर्क नही पड़ता क्यूंकि मेरा पेट खराब है .वैसे भी मै बहुत कम खाता हूँ पर किरण का क्या होगा ?वो तो बहुत खाती है।
शिशिर भी कैंटीन को लेकर परेशान है .पर वह अडजस्ट करना जानता है या फिर मजबूरी में सिख गया है ...
ईसके बावजूद हम सभी खुश हैं क्युकी हमारे सम्पादक बहुत अछे है ..उनके साथ कम करने में खूब मजा आ रहा है ...दरअसल वे चाहते हैं कि हम कुछ हटकर और नया करें इसका मतलब यह नही है कि हम पत्रकारिता छोडकर कुछ और करने लगें बल्कि इसका मतलब है कि हम आज कि पत्रकारिता से इतर नये जमाने कि पत्रकारिता कि तरफ रुख करें । कुछ नयापन लाये ,कुछ प्रयोग करें .....
बहुत ख़ुशी मिलती है जब आप अपनी शुरुआत अपने मनपसन्द माहौल में करते हैं जहाँ कोई बंदिश नही , जहाँ हर कोई मित्र कि तरह मिले और आगे बढकेअपनाये ..जहाँ हमे अपनी बात रखने का मौका हों ..अपना मनपसन्द कम करने कि छूट हों .....
बस इसीलिए कंटीन न होने के बावजूद हम खुश है ... क्युकी कई बार माहौल ऐसा भरा पूरा होता कि पेट का खालीपन अपना अहसास नही कराता .....हाँ कभी जोरों कि भूख लगती है तो थोडा दूर निकल पड़ते है ...उसका भी अपना अलग मजा है ....
पता है शिशिर बहुत बदल; गया है ...अरे वैसा बदलना नही अब वह समझदार है और हम एक साथ है ...कई बार हमारा साथ दूसरों खलता है पर हम आई आई एम् सी वाले हर माहौल में जीना और रहना जानते है ....
हम उसी तरह पोलिटिक्स भी कर सकतें हैं जैसा सामने वाला करेगा और वैसी ही दोस्ती या फिर दुश्मनी .....
मै प्रेमी हूँ और जल्द ही यहाँ भी प्रेम के रंग बिखेर दूंगा ये मेरा दावा और वादा दोनों है ..शुरुआत कर दी है लोगों के दिलों में उतरने कि ...............................आप के दिल में तो बसा ही हूँगा उम्मीद है
मै लक्ष्मी कैमरा पर्सन शिशिर और किरण के साथ ..लखनौ से
Friday, March 19, 2010
आंखों की उदास बेचैनी और उसकी अंदरूनी आक्रामकता का धनी कलाकार: अजय देवगन



मेरे दोस्तों को मेरा जुमला अजय देवगन की कसम या अजय देवगन ने चाहा तो ,से चिढ़ मचती है। दरअसल उन्हें शिकायत है कि आमिर और शाहरूख के जमाने में भला कोई अजय जैसे छोटे नाम वाले , एक्टर को तवज्जो कैसे दे सकता है. सलमान या अक्षय की बात करता तो भी एक हद तक सही था। पर अजय यह तो हद ही हो गई।
आखिर मैं बार-बार उसका नाम लेकर साबित क्या करना चाहता हूं कि मैं औरों से हटकर सोचता हूं या फिर बात इतनी है कि मुझे बस उनकी एक नहीं सुननी है। ये सभी शिकायते हैं मेरे दोस्तों की मुझसे पर ऐसा नही है कि मैं इनकी शिकायतों पर निरूत्तर हूं पर मैं जबाब कुछ यूं देना चाहता था कि फिर इन्हे कम से मुझसे कोई शिकायत न रह जाए। इसलिए मैने अजय के बारे में मन से अध्ययन किया और अब मैं उसके बारे में कुछ लिखने में सक्षम हूं।
सुना था आंखों से हो रहे संवाद का अहसास गहरे दिल में उतरता चला जाता है। अजय की एक्टिंग देखने के बाद इस अहसास को जीता चला गया। सच ,अजय नहीं बोलते उनकी आंखे बोलती हैं। बगैर शोरगुल और मीडिया हाइप के यह महान कलाकार अपना काम करते जा रहा है और आप को यह जानकर हैरानी होगी कि खान स्टारों के इस तथाकथित दौर में सबसे अधिक काम और विश्वास का पात्र अजय है।
एक्शन डायरेक्टर वीरू देवगन का यह लाडला एक्शन के साथ ही फिल्मों में प्रवेश किया यह किसी संयोग से कम नहीं। फूल और कांटे का वह ढ़ीला-ढीला, औसत चेहरे का एक अनोखे हेयर स्टाइल का एक्शन हीरो अतिथि तुम कब जाओगे तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म के हर विभाग (कामेडी,एक्शन,थ्रीलर,पारिवारिक,ट्रेजडी) का बेताज बदशाह बन जाएगा कम ही लोगों ने सोचा होगा। पर जिसने इसे भांप लिया था उसने इसका सही उपयोग किया और इसका फायदा अजय के साथ उसे भी मिला । इस कड़ी में सबसे पहला नाम महेश भट्ट का है।
अजय की आंखों की उदास बेचैनी, अंदरूनी आक्रामकता को महेश ने अपनी फिल्म जख्म में बखूबी उभारा है। जख्म अजय के फिल्मी करियर का सबसे अहम पड़ाव था। इस फिल्म के बाद अजय कभी पीछे मुड़कर नहीं देखे या यूं कहें कि देखने की नौबत भी नहीं आई।
हम दिल दे चुके सनम और प्यार तो होना ही था ने उनके करियर को नई उंचाई दी तो यहीं से उन्हे उनका प्यार भी मिला । काजोल तो मिली हीं देश के हर कोने का प्यार भी खूब बरसा। प्यार ने अपना असर दिखाना शुरू किया और देखते ही देखते संभावनाओं का यह सितारा अपनी रोशनी बिखेरने लगा।
यह सच है कि अजय के पास शाहरुख-आमिर सरीखी फैन-फालोइंग नहीं है। यह भी सच है कि अजय उनकी तरह ग्लैमराइज नहीं हैं। पर हम यह क्यूं भूल जाते हैं कि अजय की यही खासियत उनहें सबसे अलग और सब पर भारी बनाती है। पर अजय यहां भी अजय ही दिखते हैं जब वे इसके जवाब में सिर्फ इतना कहते हैं कि ,प्लीज मेरी किसी से तुलना मत कीजिए। मेरा कंपटीशन खुद से है। फिर सबके अलग फील्ड हैं ,अलग काम है ऐसे मे तुलना करना उचित नहीं। यह अजय की सादगी है। अजय अपनी इस सादगी के साथ खुश हैं।
बिना किसी संवाद के कयामत सरीखी एक्शन फिल्म के साथ कई फिल्मों को सिर्फ अपनी आंखों के कमाल से सफल बना देने वाला यह सादगी पसंद कलाकार अपनी जिन्दगी को भी खामोशी से आगे बढ़ाता जा रहा है जहां सिर्फ और सिर्फ उंचाइयां हैं।
जिन्दगी में आगे बढ़ते आंखों के जादूगर खामोश कलाकार को शत-शत नमन..............
Wednesday, February 24, 2010
सचिन का दोहरा शतक और खासियत की जंग



आज (२६ फरवरी )की सुबह कुछ खास थी. न जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है .हाँ ये जरुर है की और दिनों से इतर थी पर ऐसे तो हर दिन जुदा होता है .अब देखिये न सीधी सी बात है हर दिन का नाम भी तो जुदा है कभी सोमवार है तो अगला मंगलवार न की फिर सोमवार .अरे मै बुधवार कैसे भूल गया जिसे बार बार मै खास बता रहा हूँ .अक्सर होता है जो खास होता है एन वक्त पर भूल जाता है या यूँ कहूँ की वो इतना ज्यादा दिल के करीब हों जाता है की हमे गलतफहमी हों जाती है की भला वो भी भूल सकता है क्या और अक्सर हम इस गलतफहमी के शिकार हों जाते हैं .
खैर यहाँ कोई गलतफहमी नही है. कम से कम पुरे दिन बीतने के बाद शाम की इस आतिशबाजिय माहौल और कॉलेज की तमाम टेंसनों से दूर काफी दिनों बाद सुकून से बिस्तर पर लेटा सिर्फ एक ही चेहरा दिल और दिमाग में बसाये, गारंटी के साथ कह सकता हूँ की आज का दिन खास था .
खास तो भैया खास ही होता है . पर तभी तक खास होता है जब तक दिल के पास होता है . यकीन मानिये जो आपके दिल के करीब नही वो हर वस्तु या व्यक्ति किसी कीमत पर आपके लिए खास नही . अब खास कोई पास तो है नही की न चाहते हुए भी पास में रखा जाये .खास बनाने के लिए खुद को खास बनाने की जरूरत भी नही होती बस यहीं तो पंगा है .भला हम खुद को खास क्यूँ न बनाये .अजीब इन्सान हैं आप फालतू बात करते हैं . हम दूसरों को खास बनाएं पर खुद खास न बने . वाह क्या सलाह दिया है आपने. मुझे तो लग रहा है की आप जिन्दगी में कभी खुद किसी के खास हुए ही नही हैं इसीलिए कुंठा वश ऐसी बातें कर रहे हैं .अब बोलिए ऐसे सवालों पर आप क्या कहेंगे पता था आप जरुर कुछ कहना चाहेंगे पर मै कुछ नही कहूँगा दरअसल मुझे लगता है कि मै अभी तक खास नही बन पाया हूँ .
अब खास कि परिभाषा अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग हों सकती है .किसी के लिए ममता खास हों सकती हैं तो किसी के लिए सचिन . किसी के लिए बजट खास है तो किसी के लिए क्रिकेट .पर यहाँ भी एक बहस है जो मेरे क्लास कि बहस है वह यह कि किसी एक आदमी के लिए जो सच है वो दुसरे के लिए झूठ हों सकता है पर कई इसे मानने को तैयार नहीं उनके भी तर्कों में दम है भला जो गलत है ,अन्याय है वह दुसरे के लिए सच और न्याय का प्रतीक कैसे हों सकती है .जैसे यदि माओवादी लोगों को मार रहे है ये सच है तो सबका सच है और सरकार मओवादिओं के साथ जो कर रही है वो प्रशंशनीय है गलत है और सबके लिए गलत है .
ये बताने का मतलब बस इतना भर है कि इसी तरह सवाल उठ सकता है कि सचिन और ममता में खास कौन है . यहाँ भी एक ट्विस्ट है . कई बार खास होना समय और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है. एक ही समय में कई लोग एक ही साथ खास नही हों सकते यह ह्यूमन टेंडेंसी भी है .ऐसे समय में हमे उनके बीच चुनाव करना होता है .कई बार इस चुनाव में भी ऐसा प्रत्यासी जीत जाता है जिसके बाद में दगा देने पर लगता पहले वाला ही अच्छा था पर तब तक देर हों चुकी होती है और ५ साल के बाद के चुनाव कि तरह यहाँ भी इंतजार करना पड़ता है समय आने पर गलती सुधारने का पर कई बार इस में भी अच्छा विकल्प नही होता और मन मसोसकर किसी को भी चुन लेना पड़ता है इस तर्ज पर कि कुछ नही से तो बेहतर है कि कुछ हों .पर कई बार लगता है कि कुछ नही होना कुछ होने से बेहतर था .अब देखिये न एक कहानी में एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए माँ का कलेजा निकाल लाता है निश्चित ही वहां उसके लिए उसकी प्रेमिका खास हों चली थी जो माँ के रिश्ते पर भारी पड़ गयी . यह विवाद का विषय हों सकता है कि यहाँ खासियत नही उसका हवासिपन रहा होगा वगैरह .......................
खैर इस खास के जंग में आज बुद्धिजीवी भी फंसे पड़े है और इनकी मशक्कत भी आकर खास पर रुक गयी है . आखिर खास कौन . लाख टके का सवाल है रेल बजट या क्रिकेट . क्रिकेट देश का धर्म है और तस पर क्रिकेट के भगवान का वन डे क्रिकेट में दोहरा शतक भला इससे खास क्या हों सकता है . पर दूसरी तरफ रेल है देश को सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला .देश के करीब हर व्यक्ति से सीधे जुडाव का प्रतीक .क्रिकेट हमारे लिए जूनून हों सकता है तो रेल किसी सुकून से कम नही . क्रिकेट और रेल में कौन है जिसके बिना भी जिन्दगी में एक रफ्तार बनी रह सकती है ...
कल अख़बार के पहले पेज पर अपने खास को देखने और दीखाने का जंग है . चूँकि यहाँ दीखाने वाले कि इस जंग में चलेगी इस लिए देखने वाले के पास सिवाय इंतजार के खुछ नही पर देखने वाले ने अपने खास को तय कर लिया है उसे पता है कि उसका खास कौन है और कल सुबह वह उसे ही देखने हेतु अख़बार चाहेगा बस अब यही चुनोती है दिखाने वाले के सामने . इस एकतरफा मैच में भी उसके हारने कि पूरी सम्भावना बरकरार है यदि वह देखने वाले के अनुरूप नही दिखा पाए .अब यहाँ एक और बहस सामने आती है कि इसका मतलब तो यही है कि हमे वही दिखाया जाता है जो हम देखना चाहते हैं अगर ऐसी ही बात है फिर हम बार बार इन्हें क्यूँ कंटेंट के लिए दोषी ठहराते हैं. पर यह मामला वैसा नही है क्यूंकि यहाँ हमने खुद को उसके लिए तयार किया हुआ है पर वहां हम ऐसी कोई तयारी नही होती हमे पता भी नही होता सामने क्या आने को है .चूकि ये दिल के करीब है इसलिए खास है और इसीलिए इस खास कि इतनी बेसब्री से आस है
वरना आज दोपहर से ही चैनलों ने अपने अपने खास को पुरे इत्मिनान से परोसा और दर्शकों ने भी जिसे अपना खास पाया उससे जुडाव पाया . उसके बारे में चर्चाएँ हुयीं . उसे आत्मसात किया गया . फिर भी एक कसक है ,एक ललक है उस खास के बारे में और जानने कि और पढने कि उसके और करीब जाने . यही वजह है कि कल सुबह का अभी से इंतजार है पर आज कि रात इतनी जालिम है कि कटती नहीं . अक्सर ऐसा होता है ,महसूस किया होगा जब किसी खास का इंतजार करो तो समय का चक्र बहुत धीरे घुमने लगता है .एक एक पल काटना मुश्किल होता है और पल तो मानो सालों में बदल रहे हों.
हम भी आज सुबह में रेल बजट पर लैब जर्नल निकाल रहे थे और शाम होते होते चर्चा तुल पकड़ ली कि ममता कि रेल कि जगह सचिन कि कहानी सेल करो .सचिन कि कहानी ज्यादा बिकेगी .पढ़ रहे है जानते हैं पर आगे तो व्यवसाय ही करनी है न. इसलिए यहाँ बेचने वाली बात तो करनी ही होगी ख़ुशी तो ईस बात कि है सारे दोस्त इस व्यवसाय के फायदे नुकसान को समझने लगे हैं .अब इसमें क्या छुपाना ८ महीने में ८०० बार बताया गया कि पत्रकारिता एक शुद्ध व्यवसाय है ..तभी तो हर कोई इस बात को लेकर भी परेशान था कि ऐसे मौकों पर किसे खास माना जाये . लेकिन आश्चर्य हुआ मुझे ये देखकर कि आज हम सभी को अपने लिए खास को इस आधार पर नही चुनना है कि वो हमारे दिल के कितने करीब है और हमे कितना अच्छा लगता है बल्कि इस आधार पर चुनना है कि वो बाजार में कितना फायदा पहुंचा सकता है .
सच आज खास कि परिभाषा भी कुछ खास हों गयी है .कल को खास कि परिभाषा एक बार फिर बदल जाये तो चिंतित मत होईयेगा .क्यूंकि जिन्दगी में कई बार अलग अलग समय पर अलग अलग लोग खास होंगे . कुछ खास पास में होंगे तो कुछ सिर्फ आभास में होंगे.पर जो भी खास होगा उसका एक एहसास होगा ..इस एहसास से ही उसके खास होने का विश्वाश होगा .
मैंने तो आज अपने खास दिन के लिए एक खास को अपने दिल दिमाग में बसा लिया है मै कल उसी कि खबरों की तलाश करूंगा और अगर आपका भी कोई किसी दिन या आज भी खास बन गया है तो कल से उसकी तलाश कीजिये. सच अपने लिए किसी खास की तलाश करना और फिर उसके बारे में जानने का प्रयास अपने आप में बहुत ही दिलचस्प और मजेदार है मुझे तो कम से कम इसकी अनुभूति हों रही है और मैं आपसे अपना अनुभव शेयर कर रहा हूँ .
शुभ रात्रि.
Tuesday, February 16, 2010
हाइटेक प्यार का दौर और आज की युवा पीढ़ी

वेलेंटाइन डे यानि प्यार का दिन। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से बिल्कुल अलग होने के बावजूद भारतीय समाज में किसी पर्व एवं त्योहार से कहीं ज्यादा खास हो चली है। यही नहीं करीब एक सप्ताह पहले से ही न जाने किस-किस डे के रूप में इसे मनाने की परंपरा है और यह बड़ी तेजी से भारतीय जनमानस में घुलती जा रही है।
मैं यहां न तो वेलेंटाइन को दोषी ठहराने की कोशिश कर रहा हूं ना ही उसकी उन्मुकतता से मुझे कोई परेशानी है और ना ही मैं उसके इतिहास में जाना चाहता
हूं । मेरा सीधा सा प्रश्न है कि क्या वेलेंटाइन का यथार्थ आज भी समाज में जिन्दा है? क्या प्यार का मतलब आज भी युवाओं के लिए वही है जो पहले था ? अहम सवाल यह भी है कि वेलेंटाइन का इस तरह से मनाया जाना क्या उचित है?
निश्चित ही आज समाज में वेलेंटाइन का मतलब बदल चुका है। आज वेलेंटाइन प्रेमी-प्रेमिकाओं के दम पर नहीं अपितु बाजार के दम पर जिंदा है। मीडिया और बाजार ने आज वेलेंटाइन का ऐसा आकर्षक रुप पैदा किया है कि न चाहते हुए भी युवा इसके आकर्षण के फंदे में फंसने को मजबूर हैं। आलम यह है कि लड़के-लड़कियों पर एक दूसरे को वेलेंटाइन बनाने का भूत सवार है।
कीमती तोहफों,तमाम साजो-सामान के साथ प्रेम निवेदन किया जा रहा है। इस वर्ष जो जिसका वेलेंटाइन है ,वह पिछले वर्षों में कितनों का वेलेंटाइन रहा है ,न तो कोई जानता है और ना ही जानना चाहता है। यह सिलसिला लगातार चल रहा है और आज का बाजार इसे आगे बढ़ाने के लिए हर तरह से प्रयासरत है। बाजार के कारण ही आज प्रेम निवेदन का सबसे बड़ा हथियार एसएमएस बन गया है। आज जज्बात नहीं जिस्म बोलते हैं।
प्यार के तीन भाग होते हैं- आत्मीयता,आवेग और प्रतिबद्धता । क्या मौजूद है ये तीनों गुण आज वेलेंटाइन मना रही युवा पीढ़ी के भीतर। निश्चित ही इसका जबाब न होगा। क्योंकि अब समय और वेलेंटाइन के मायने बदल चुके हैं। आज के हाइटेक प्यार के दौर में प्रेमी-प्रेमिकाओं के पास इतना वक्त कहां है कि वे उन खूबसूरत लम्हों को जिएं और एक दूसरे की भावनाओं को महसूस कर सकें। अब तो शार्टकट का जमाना है। प्यार में भी शार्टकट ने अपने लिए जगह बना ली है और इस शार्टकट के नए फार्मूलों में युवा पीढ़ी जल्दी से जल्दी वेलेंटाइन के अधिक से अधिक स्वाद चखने को बेकरार है।
आज प्यार में कितनी सच्चाई है और कितना प्यार करती है आज की युवा पीढ़ी एक दूजे से यह तो इनके कारनामों से ही स्पष्ट हो जाता है। कोई बेवफाई का इल्जाम लगाकर अपनी प्रेमिका को गोली मार रहा है तो कोई प्रेमिका को पाने के लिए अपने मां-बाप को,तो वहीं कोई दूसरी लड़की के चक्कर में अपनी ही बीबी को मौत के हवाले कर रहा है। क्या यही है वेलेंटाइन का यथार्थ ?
वेलेंटाइन के नाम पर जो माहौल आज समाज में पैदा हो रहा है उसके परिणाम स्वरूप ही दुनिया के तमाम मंचों से इसके विरोध में स्वर उठने शुरू हो गए हैं।
एक दार्शनिक ने तो लव को `ए मिसअंडरस्टैंडिंग बिटवीन टू फूल्स` करार दिया है तो वहीं वेलेंटाइन के धूर विरोधी चार्ली लिखते हैं- ~वेलेंटाइन डे अकेला एक ऐसा राष्ट्रीय पर्व है जो एक दिमागी बीमारी को समर्पित है। आपाहिज बनाने वाले लव नाम के इस छलावे को मनाने के लिए लोग फूल भेजेंगे,विज्ञापन छपवाएंगे और रेस्तरा बुक करवाएंगे। चार्ली ने तो वेलेंटाइन डे के पागलपन से मुकाबले के लिए 15 फरवरी को अनवेलेंटाइन डे के रूप में मनाने की नसीहत तक दे डाली। उनके अनुसार एक दिन तो इश्क के निगेटिव पहलुओं को भी समर्पित होना चाहिए। एक ऐसा दिन जब लोग ऐसे संदेशों को भी भेज सकें ......तुमने मेरी जिन्दगी बर्बाद कर दी अब हमें अलग हो जाना चाहिए.........माफ करो बाबा.......।
प्रेम का वास्तविक रूप यह नहीं है जो आज समास में व्याप्त है। प्रेम में समर्पण का भाव होता है उसमें बनावटीपन और खोखलापन नहीं होता। प्रेम का असली पाठ तो हम उस छोटे से नीरीह कीट से सीख सकते हैं जो यह जानते हुए भी की दीपक के पास जाने से उसके अस्तित्व को खतरा है वह प्रेम ही है जिसके वशीभूत वह अपने प्राण तक को न्योछावर करने से पीछे नहीं हटता। लैला-मजनूं, हीर-रांझा, सीरी-फरहाद की प्रेम कहानियां यदि सिर्फ गुलाबों की अदला-बदली से लेकर शारीरिक प्रेम तक ही सीमित होतीं तो अमर प्रेम कहानी नहीं बनतीं अपितु कब की मिट गई होतीं परंतु ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वहां दिखावा नहीं वास्तविक प्रेम था। वहां झूठे प्रेम के फेहरिस्त में शामिल होने और दोस्तों को अपनी प्रेममयी लिस्ट दिखाने की होड़ नहीं थी बल्कि अपने प्रेम को भगवान का रूप मानकर उसे वरण करने की ललक थी। तब दिल से दिल के मिलन का चलन था आज जिस्म से जिस्म के मिलन की चाहत है।
जरूरत है वेलेंटाइन के यथार्थ तो समझने की। वेलेंटाइन के उस स्वरूप को समझने की जिसमें सादगी है,अपनापन है,समर्पण है। आज की युवा पीढ़ी हर मामले में अपने पुरखों से आगे है और नित आगे निकलने के प्रयास में है तो फिर प्रेम के क्षेत्र में यह पिछड़ापन क्यूं क्या उस बाजारवाद के कारण जो इतना हावी हो गया है कि जब चाहे तब हमको हमीं से चुरा ले और हम ऐतराज भी न जता सकें। आखिर ऐसा कब तक चलेगा ? युवा पीढ़ी को समय रहते इससे पार पाना होगा। बाजार से उपर उठकर प्यार के सच्चे आयाम को अपनाना होगा। और तब.....................
`` जिस्म नहीं जज्बात बोलेंगे,
लोग तोहफे नहीं प्य़ार तोलेंगे। ``
Monday, January 11, 2010
क्यूँ अक्सर हमारे साथ ऐसा होता है ..........?

कभी कभी हम अनायास ही किसी के बहुत करीब पहुँच जातें हैं .उसकी हर बातें अच्छी लगने लगती है .वो हर पल दिल को भाने लगता है .कोई उसके बारे में कुछ भी गलत बोलने की कोशिश भर करे तो चिढ सी मचने लगती है .रोजाना बस उसी का ख्याल होता है .हर दिन दर्शन हो जाएँ दिल को बस इसी का आस होता है । न मिले ,न दिखे तो बेचैनी सी रहती है दिल में । सारा दिन बोझ सा लगता है । समय काटते नहीं कटते और गुस्सा दूसरों पर उतरता है
कई बार तो हम बहाना खोजते हैं । उससे मिलने के लिए तो कभी बात करने के लिए .कभी उसे छूने के लिए तो कभी कैमरे में कैद करने के लिए.पर जो भी बहाने बनाते हैं वो बड़े इत्मिनान और सोच समझकर बनाते हैं की उसे चोट न पहुंचे ।
इस क्रममें एक छोटी सी गलती अक्सर हमसे हो जाती है। हम यह नही समझने की कोशिश करते की की आखिर सामने वाले के दिल में क्या है, क्या उसे भी बेचैनी होती है ,क्या उसे भी हर पल हमारा ख्याल होता है ?
दरअसल हम प्रेमियों की बिडम्बना ही यही है की कई बार हम जान बुझकर भी बुने भ्रम की स्वप्निल दुनिया में जीना पड़ता है । इस दौरान कई बार हम जगे होतें हैं पर जबरदस्ती आँखे मूंदे होतें है क्यूंकि एक अनचाहा डॉ होता है इस हसीं ख्वाब के बिखरने का ।
पर सच तो सच होता है एक न एक दिन तो उसे सामने आना ही है । और उस पर भी दिल्लगी के सच तो और भी क्रूर होतें हैं जो कई बार इतने भूखे होतें हैं की की बिना वक़्त गवाएं कई कई जिंदगियां लील जातें हैं ।
हालाँकि हम जैसे कुछ लोगों के साथ उस भयावह सच के सामने आने पर भी ऐसा कुछ घटित नही होता क्यूंकि हमे कई बार आगे-पीछे का भी सोचना पडतहै और इस सोचने की क्रम में शुक्र है की हम इसे जिन्दगी में ज्यादा महत्वपूर्ण न मानकर जिस तरह भी हो सके उससे उबरने की कोशिश करते हैं । पर दिल के किसी कोने में एक जख्म तो बन ही जाता है जो गाहे बगाहे पीड़ा पहुंचाते रहता है ।
अक्सर ऐसी बेवफाई के बाद जब हम तन्हाई में होतें हैं तो इशी रिश्ते के बारे में सोचा करतें हैं । इससे जुडी अतीत की यादें सुखद कम दुखद ज्यादा प्रतीत होती है .जैसे जैसे अतीत के पन्ने खुलते जाते हैं वैसे-वैसे हम सच से रूबरू होते जाते हैं । तब हम पातें हैं की दरअसल उस समय जब हम खुश होते थे वह बनावती ख़ुशी थी । उसके प्रति लगाव और उसकी बैटन को बिना प्रतिकार मानते जाना सिर्फ और सिर्फ दैहिक आकर्षण था प्रेम तो वहन था ही नही ।
इस सोचने के क्रम में हम हम कभी खुद को तो कभी सामने वाले को दोषी ठहरातें हैं । उलझने बढती ही रहतीं है । किसी को भी दोषी ठहराएँ दिमागी कसरत तो अपनी ही होती है .फिर इन तन्हाइयों और अतीत की इन यादों से आजिज आकर इससे दूर होने का माध्यम ढूंढते हैं जो कई बार खतरनाक स्टेप होते हैं
हमे अक्सर ऐसा करते समय ये बात याद रखनी चाहिए की की जिस माध्यम को हम इससे दूर होने के लिए अपना रहे है वे कुछ समय मात्र के लिए होता है जबकि यादें और तन्हाईयाँ हमारे साथ तब तक बनी रहती है जब तक की हममे जान रहती है .
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